Tue. Jul 23rd, 2024

हिमाचल प्रदेश में 18 हजार स्कूल व काॅलेज चलाए जा रहे हैं तथा 2300 स्कूल निजी संस्था द्वारा चलाए जा रहे है। शिक्षा, विधि एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश भारद्वाज ने आज वैबनार के माध्यम से हिमाचल प्रदेश विश्व विद्यालय के मानव संसाधन केन्द्र द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के उपरांत यह विचार व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि आर्थिकी की अर्थव्यवस्था को पटरी में लाया जा सकता है परन्तु शिक्षा के क्षेत्र में एक साल भी किसी छात्र का पढ़ाई न होने के कारण खराब हो जाए तो उसकी पूर्ति संभव नहीं है।
उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस का सर्वप्रथम पता नवम्बर, 2019 में चीन में चला और इसके फैलाव एवं घातकता को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे 11 मार्च, 2020 को विश्वव्यापी महामारी घोषित कर दिया। आज ये महामारी दुनिया के लगभग 215 देशों में फैल चुकी है और विश्वभर में लगभग 1 करोड़ 40 लाख लोगों में कोरोना की पुष्टि हुई है जिसमें से लगभग 6 लाख लोगों की मृत्यु हुई है। भारत वर्तमान में 10 लाख से अधिक कोरोना रोगियों के साथ अमेरिका और ब्राजील के पश्चात् विश्व में तृतीय स्थान पर है।
उन्होंने कहा कि ॅभ्व् द्वारा कोविड को महामारी घोषित करना और भारत में शैक्षणिक संस्थानों का बंद होना एक दम साथ-साथ ही हुआ है। हालांकि लाॅकडाउन की प्रक्रिया देश में 24 मार्च से प्रारम्भ हुई किन्तु शैक्षणिक संस्थानों में विद्यार्थी 13 मार्च से आने बंद हो गए थे। यद्यपि कोरोना का प्रभाव स्वास्थ्य, आर्थिकी, राजनैतिक सहित सभी क्षेत्रों पर हुआ है किन्तु शिक्षा क्षेत्र पर इसका अत्यधिक प्रभाव हुआ है।
उन्होंने बताया कि देशभर में सभी स्कूल काॅलेज पिछले 4 माह से अधिक समय से बंद है और सभी सावधानियों के बावजूद भविष्य के लिए अनिश्चिताएं बनी हुई है। उन्होंने कहा कि सभी परीक्षाएं स्थगित या रद्द करनी पड़ी है और विद्यार्थी अनिश्चिताओं के कारण अवसाद ग्रस्त हो रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा है क्योंकि वे मेडिकल इंजीनियरिंग लाॅ और अन्य व्यवसायिक परीक्षाओं के लिए बैठ नहीं पाए है और भविष्य असमंजस में है।
उन्होंने बताया कि हिमाचल प्रदेश में लगभग 15 हजार शैक्षणिक संस्थान (प्राथमिक विद्यालयों से महाविद्यालयों तक) 4 माह से बंद है और पहाड़ी दुर्गम प्रदेश में वैकल्पिक व्यवस्था जैसे आॅनलाईन पढ़ाई करवाना अत्यंत दुर्लभ है क्योंकि इसमें आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी आदि अनेकों समस्याएं है और मुख्यतः इस प्रक्रिया को विद्यालयों में जिसमें प्राथमिक विद्यालय है में लागू करना और भी मुश्किल है। इस माहमारी से डिजिटल डिवाईड का और अधिक गहराने की आशंका है। उन्होंने बताया कि वरिष्ठ माध्यमिक पाठशालाओं में 72 प्रतिशत तथा प्राथमिक स्कूलों में 63 प्रतिशत डिजिटल पढ़ाई करवाई जा रही है।
उन्होंने बताया कि अचानक आई विपदा के पश्चात् सरकार के प्रयासों के साथ बहुत से निजी व्यवसाथियों तथा व्यक्तियों ने वैकल्पिक मार्गों की तलाश की है जिससे वर्चुअल क्लास रूम, आॅनलाईन पेपर, टीवी और रेडियों के माध्यम से शिक्षा प्रसार हेतु पृथक चैनल का प्रारम्भ होना सकारात्मक पहलू है। शिक्षा क्षेत्र में पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप की सम्भावनाएं भी उजागर हुई है।
उन्होंने कहा कि लोकल के लिए वोकल का शिक्षा पर भी असर हुआ है। जिससे स्वदेशी माध्यमों पर अनुसंधान की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई है, जिससे शिक्षा एवं रोजगार में नई संरचना स्थापित होगी।
इस अवसर पर राष्ट्रीय सचिव अतुल कोठारी, उच्च शिक्षा समिति हिमाचल प्रदेश के अध्यक्ष डाॅ. सुनिल गुप्ता, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. सिकन्दर कुमार, मानव संसाधन विकास केन्द्र के निदेशक डाॅ. डी.डी. शर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त किए